बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे” पर प्रदर्शनी
यह आयोजन केवल एक सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं था, बल्कि उस माहौल के बीच एक सशक्त हस्तक्षेप था

नीरज सोनी स्टेट क्राइम हेड
लखनऊ विश्वविद्यालय के टैगोर लाइब्रेरी परिसर स्थित गांधी प्रतिमा पर आज कॉलेज ऑफ आर्ट्स एंड क्राफ्ट के छात्रों के कला समूह कलरव द्वारा “बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे” शीर्षक से एक कला प्रदर्शनी का आयोजन किया गया। यह आयोजन केवल एक सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं था, बल्कि उस माहौल के बीच एक सशक्त हस्तक्षेप था जहाँ विश्वविद्यालयों में अभिव्यक्ति, संवाद और असहमति के स्पेस लगातार संकुचित किए जा रहे हैं।
आज जब छात्रों की आवाज़ों को नोटिस, प्रतिबंध और प्रशासनिक दबावों के जरिए नियंत्रित करने की कोशिशें तेज़ हुई हैं, ऐसे समय में इस प्रदर्शनी ने यह स्पष्ट किया कि कला केवल सौंदर्य का माध्यम नहीं, बल्कि समाज के भीतर सक्रिय हस्तक्षेप करने की क्षमता रखने वाली एक जीवंत भाषा है। इस प्रदर्शनी ने सार्वजनिक स्थल को एक वैकल्पिक सांस्कृतिक स्पेस में बदलते हुए यह स्थापित किया कि कलाकार और उनकी अभिव्यक्ति समाज से अलग नहीं, बल्कि उसके भीतर हस्तक्षेप करने वाली ताकत हैं।हैंडक्राफ्ट श्रेणी में आन्या चौधरी और श्वेता यादव ने अपनी रचनाओं के माध्यम से हस्तकला की संवेदनशीलता और सामाजिक अनुभवों को सामने रखा। पेंटिंग प्रदर्शनी में नीरज वर्मा (तृतीय वर्ष), पूर्वी (तृतीय वर्ष), निखिल (द्वितीय वर्ष), अवंतिका (प्रथम वर्ष), दिव्यांशी चौधरी (प्रथम वर्ष), गोल्डी (द्वितीय वर्ष), पूर्णिमा पाठक (द्वितीय वर्ष), स्रस्ती (तृतीय वर्ष), रुख्मिनी निषाद (तृतीय वर्ष), नितिन (तृतीय वर्ष), जान्हवी (तृतीय वर्ष), संतोष वर्मा (प्रथम वर्ष), अतुल वर्मा (तृतीय वर्ष), रितेश कपूर (द्वितीय वर्ष), कृष्णा यादव (द्वितीय वर्ष), अनुज चौबे (चतुर्थ वर्ष), रुद्र प्रताप सिंह (चतुर्थ वर्ष) और शनि (द्वितीय वर्ष) ने भाग लेते हुए अपने समय, समाज और निजी अनुभवों को रंगों और रूपों के माध्यम से व्यक्त किया इस प्रदर्शनी के आयोजकों ने इसके उद्देश्य और आवश्यकता पर अपने विचार रखते हुए कहा:नितिन (तृतीय वर्ष) ने कहा, “जब संस्थान सवालों से असहज होने लगते हैं, तब कला उन सवालों को और तीखे तरीके से सामने लाती है। हमारी कोशिश है कि कला समाज के भीतर संवाद और असहमति की जगह को मजबूत करे।”नीरज (तृतीय वर्ष) ने कहा, “यह प्रदर्शनी एक शुरुआत है, जिसमें हम कला को केवल दीवारों तक सीमित नहीं रहने देना चाहते, बल्कि उसे सार्वजनिक जीवन और जनसरोकारों से जोड़ना चाहते हैं।”जान्हवी शर्मा (तृतीय वर्ष) ने कहा, “अभिव्यक्ति का अधिकार केवल किताबों में लिखा हुआ सिद्धांत नहीं है, बल्कि उसे जीना पड़ता है। यह प्रदर्शनी उसी अधिकार को व्यवहार में लाने की एक कोशिश है।”अतुल वर्मा (तृतीय वर्ष) ने कहा, “कला को अगर समाज से काट दिया जाए, तो वह केवल सजावट बनकर रह जाती है। हम कला को विचार और हस्तक्षेप के रूप में स्थापित करना चाहते हैं।”अवंतिका (प्रथम वर्ष) ने कहा, “इस मंच ने हमें यह भरोसा दिया कि हमारी आवाज़ मायने रखती है। पहले वर्ष के छात्र होने के बावजूद हम यहाँ बराबरी से अपनी बात रख पाए।”प्रवेश (प्रथम वर्ष) ने कहा, “यह आयोजन किसी एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि एक सामूहिक प्रक्रिया का परिणाम है, जहाँ हर छात्र की भागीदारी ने इसे संभव बनाया है।”रितेश कपूर (द्वितीय वर्ष) ने कहा, “आज के समय में बोलना ही एक राजनीतिक क्रिया बन चुका है। कला के माध्यम से बोलना, समाज में अपनी मौजूदगी दर्ज कराना है।”निखिल (द्वितीय वर्ष) ने कहा, “हमारा प्रयास है कि कला गैलरियों तक सीमित न रहे, बल्कि आम लोगों के बीच पहुंचे और उनके अनुभवों से जुड़े।”
कलरव द्वारा आयोजित यह प्रदर्शनी इस बात का स्पष्ट संकेत है कि कला के छात्र अपने समय के सवालों से मुंह मोड़ने के बजाय उन्हें समझने और उन पर हस्तक्षेप करने के लिए तैयार हैं। यह पहल विश्वविद्यालय परिसर में वैकल्पिक, लोकतांत्रिक और जीवंत सांस्कृतिक स्पेस के निर्माण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।



